Voyager 2 NASA Solar System Exploration, Voyager mission

आज चलते हैं Voyager 2 के सफर पर 

एक ऐसा मिशन जिसने हमें सौरमंडल के उन रहस्य से रूबरू कराया जिनके बारे में शायद ही हम कभी जान पाते। आज डीपस्पेस नेटवर्क में यात्रा करने वाले इस स्पेसप्रोब ने 42 साल पहले धरती की सतह से उड़ान भरी थी। लेकिन अब ये मिशन अपने खात्मे की और बढ़ रहा है। अपनी पॉवरफुल योजना और बेहतरीन तकनीक के चलते ये NASA के सबसे सफल मिशन में से एक माना जाता है। जी हां , हम बात कर रहे हैं  Voyager 2 की।
आज धरती से 18 बिलियन किलोमीटर की दूरी  पर होने के बाद भी ये स्पेसक्राफ्ट यूनिवर्श का पता लगाने के लिए काम कर रहा है। इतनी दूरी पर होने के बावजूद भी ये ऑपरेटर से कम्यूनिकेट कर पा रहा है। इस मिशन ने एस्ट्रोनॉमस को कई कामयाबी दिलाई। तो चलिए इस स्पसेप्रोब की यात्रा पर नजर  डालते हैं। 


20 अगस्त 1977 में केपकनारवल से लॉन्च हुआ ये स्पसेप्रोब NASA के सबसे लॉन्गेस्ट रनिंग स्पेसक्राफ्ट में से एक है। इस स्पेसक्राफ्ट को NASA ने बाहरी ग्रहों की स्टडी के लिए लॉन्च किया था। हालांकि इस स्पसेप्रोब का नाम Voyager 2 है। लेकिन इसको Voyager 1 से 16 दिन पहले अंतरिक्ष में लॉन्च किया गया था। NASA का ये दूसरा ऐसा स्पेसक्राफ्ट है जिसने इंस्टेटेसलेर स्पेस में एंटर किया। 1977 से NASA के लिए काम कर रहा ये अकेला ऐसा यान है जिसने यूरेनस और नेप्चून की यात्रा की। आउटर सोलर सिस्टम में अपनी यात्रा के दौरान इस प्रोब ने सभी गैसजेन्ड का दौरा किया और उनके कई मून्स का पता लगाया। हालांकि ये यान काफी कुछ अपने ट्विन की तरह था। लेकिन इसका जर्नी पाथ Voyager 1 से काफी कुछ अलग होने के साथ धीमा भी था 

इसे धीमा रखने का कारण यूरेनस और नेप्चून थे। ताकि ये प्रोब इन दोनों गैसजाएन्ड तक आसानी से पहुंच सके। इसकी यात्रा के दौरान इसके रास्ते में जब सैटर्न ग्रह आया तब उसकी ग्रेवटी के कारण यह यूरेनस की और चला गया। इस वजह से ये Voyager 1 की तरह ही जुपिटर के चंद्रमा, टाइटन की ऑब्जरवेशन नहीं कर पाया। लेकिन फिर भी ये यूरेनस और नेप्चून तक पहुंचने वाला प्रथम यान था। Voyager 1 की तरह ही Voyager 2 को भी हमारी सौरमंडल के एजिज को ढूंढ़ने और उनका अध्ययन करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। 1989 में नेप्चून की ऑर्बिट में ग्रैवेटशनल पुल के कारण इसे इलेक्ट्रिकल प्लेन से नीचे वाले कोर पर सेट कर दिया। जिस कारण ये 5 नवंबर 2018 को इंस्टेटेसलेर स्पेस में पहुंचने में कामयाब रहा। 1998 में इसे बनाने वाले इंजीनियर ने पावर को बचाने के लिए इसके कई इस्ट्रूमेंट को स्विच ऑफ कर दिया। हालांकि उनमें से सिक्स इंस्ट्रूमेंट आज भी काम कर रहे हैं। और अनुमान है कि 2025 तक हमें डाटा मिलता रहेगा। 

Voyager 2 सौरमंडल के सभी गैसजाएन्ड  का अध्ययन करने वाला एकमात्र अंतरिक्ष यान है। Voyager 2 ने जूपिटर के 14वें चाँद की खोज की। Voyager 2 यूरेनस और नेप्चून से गुजरने वाला पहला First Man maid Object था। यूरेनस पर Voyager 2 ने 10 नए चाँद और 2 न्यू रिंग्स  खोजे। नेप्चून में Voyager 2 ने 5 चाँद ,4 रिंग्स और एक ग्रीक डार्क स्पॉट की खोज की। 

1974 में मिशन पायनियर्स ने एक मिशन का प्रस्ताव रखा। जिसमें अगर पहला Voyager सफल रहा तो दूसरे को ग्रेविटी असिस्टेंट मेन्यूवर्ष का इस्तेमाल कर यूरेनस और फिर नेप्चून पर भेजना था। ग्रहों और उनके चाँद की तस्वीरों को लेने के लिए दोनों स्पेसक्राफ्ट में स्लो स्कैन कलर टीवी कैमरा के साथ एक इंस्ट्रूमेंट और जोड़ दिया गया था जो उन्हें मैग्नेटिक फील्ड ,अट्मॉस्फेयर ,उनके चाँद और प्लैनेटरी सिस्टम से जुड़ा हुआ डाटा रिकॉर्ड करने के लिए दिया गया था। इन दोनों स्पेसक्राफ्ट का नाम पहले मरिनुस 11 और मरिनुस 12 रखने के बारे में विचार किया जा रहा था। लेकिन फिर NASA अडमिंस्ट्रेटर दुवारा बदलकर इसे Voyager कर दिया गया। 
Voyager 2 ने जूपिटर पर कई महत्वपूर्ण बदलावों का पता लगाया और 17000 नई तस्वीरे ली। Voyager 2 ने  जूपिटर के रिंग के तीसरे कम्पोनेंट का भी पता लगाया। जूपिटर से गुजरने के बाद Voyager 2 ने अपना रुख सेटर्न की और किया। सेटर्न से गुजरते समय इस प्रोब ने इसके चाँद और रिंग की काफी खूबसूरत तस्वीरों को कैप्चर किया। 

इन दोनों प्लेनेट के एनकाउंटर के बाद Voyager 2 को यूरेनस की यात्रा पर भेजा गया। इस यात्रा के दौरान Voyager 2 ने यूरेनस के 10 मून्स का पता लगाया। इस अंतरिक्ष यान ने यूरेनस के वायुमण्डल में हवा की गति 724 कलोमीटर / घंटा पायी और बादल की सतह के नीचे इसे एक बोइलिंग वाटर ओशन होने के प्रमाण मिले।